Nisha

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बाग़ो बहार



         जब मेरे पास बैठा तब मैंने उससे पूछा की आज रुकावट और नाराज़गी की वजह क्या है। इतनी शोखी और गुस्ताखी  कभी न की थी। हमेशा बिला उज़्र हाज़िर होता था। तब उसने कहा की मैं गुमनाम गरीब ,हुज़ूर  की तवज्जा से और अम्न दौलत से  के ज़रिये इस मक़दूर से पंहुचा बहुत आराम से ज़िन्दगी गुज़रती है। आपके जान व माल को दुआ करता हु  बादशाह ज़ादी के माफ़ करने के भरोसे ,इस गुनहगार से सरज़द हुई। उम्मीद वार हु। मैं तो जान व दिल   से उसे चाहती थी ,उसकी बनावट की बातो को मान लिया और शरारत पर नज़र न की। बल्कि फिर दिलदारी  से पूछा : क्या तुझको ऐसी मुश्किल कठिन पेश आयी ,जो ऐसा फ़िक्र हो रहा है ? उसको अर्ज़ कर उसकी तदबीर हो जाएगी। 

 गरज़ उसने अपनी खाकसारी की राह से यही कहा की मुझको सब मुश्किल है और  आपके रु बा रु सब आसान है। उसके कलाम और बत कहाओ से यह खुला की  एक बाग़ निहायत सरसब्ज़ और ईमारत आली ,हौज़ ,तालाब कुए पुख्ता समेत ,गुलाम की हवेली के नज़दीक ,नाफ शहर में बकाओ है और उस बाग़ के साथ एक लौंडी भी गएँ के इल्म  मौसिक़ी में खूब सलीक़ा रखती है। लेकिन यह दोनों बाहम बिकते है ,न अकेला बाग़ ,जैसे ऊंट के गले में बिल्ली  .जो कोई वह लेवे ,इसकी क़ीमत देवे। और तमाशा यह यह है ,बाग़ का मोल ,लाख रूपये और  उस बांदी का बहा  ,पांच लाख। फिदवि से  इतने रूपये सर अंजाम नहीं हो सकते। मैंने उसका दिल बहुत बे इख़्तियार शौक़ में उनकी  खरीदारी के पाया ,की उसी वास्ते दिल हैरान और खातिर परेशान था। बावजुद  की रु बा रु मेरे पास  बैठा  था तब भी उसका चेहरा मलीन और जी उदास था। मुझे तो खातिरदारी उसकी हर घडी और हर पल मंज़ूर थी  ,उसी वक़्त ख्वाजा सिरा को हुक्म किया की कल सुबह को क़ीमत इस बाग़ की लौंडी समेत चूका कर क़बाला बाग़  का और खत कनीज़ का लिखवा कर ,उस शख्स के हवाले करो ,और मालिक को ज़रे क़ीमत खज़ाना आमिरः  से दिलवा दो।

 इस परवानगी के सुनते ही ,आदाब बजा लाया सारी रात उसी क़ायदे से हसीं ख़ुशी से गुज़री। फज्र होते ही वह रुखसत  हुआ। खुजे ने कहने के मुताबिक़ उस बाग़ को और लौंडी को खरीद दिया कर दिया।  फिर वह जवान रात को  मामूल के आया जाया करता था। एक रोज़ बहार के मौसम में की मकान भी दिलचस्प था बदली घुमड़ रही थी। बिजली भी कूद रही थी। और हवा नरम नरम बहती थी। गरज़ अजब कैफियत इस दम थी। जो नहीं रंग बा रंग के हबाब  और गुलाबिया ताको पर परचाने हुए नज़र पड़ी। दिल ललचाया एक घूँट लू। जब दो तीन प्यालो की नौबत पहुंची  वह ही ख्याल इस बागे नौ खरीद का गुज़रा। कमाल शौक़ हुआ की एकदम इस आलम में वहा की सैर किया  चाहिए। कमबख्ती जो आये। ऊंट चढ़े कुत्ता काटे। अच्छी तरह बैठे बिठाये ,एक दायी को साथ लेकर ,सुरंग की राह  से उस जवान के मकान में गयी। वहा से बाग़ की तरफ चली। देखा तो ठीक उस बाग़ की बहार ,बहिश्त की बराबरी कर रही है।,  क़तरे मींह के सुर्खी  दरख्तों के सर सब्ज़ पत्तो पर जो पड़े है। गोया जमररद की पटरियों पर मोती जड़े है। और सुर्खी फूलो की उस अब्र में ऐसी चहचही लगती है। जैसे शाम को शफ़क़ फूली है। और नहरे लबालब  ,मानिंद फ़र्शे आईने के नज़र आती है ,मौजे लहराती है।

        गरज़ की इस बाग़ में हर तरफ सैर करती फिरती थी  की दिन हो चूका ,सियाही शाम की नमूद हुई। इतने में जवान एक रोशन पर नज़र आया और मुझे देख बहुत अदब और गरम  जोशी से आगे बढ़ के अपने हाथ पर धर कर  बारह  दरी की तरफ चला।  जब वहा मैं गयी तो वहा के आलिम ने सारे बाग़ की कैफियत को दिल से भुला दिया। यह  रौशनी का ठाठ था हर तरफ कुमकुमे ,चिरागा ,फानूस ख्याल शमा मजलिस हैरान रोशन थी ,की शबे बारात ,बावजूद  चांदनी और चिरागा के ,इस  के आगे अँधेरी लगती।  एक तरफ आतिश बाज़ी ,फुलझड़ी ,महताबी हथ फूल  ,चरखी पटाखे ,सितारे छूटते थे।

इस अरसे में बादल फट गया और चाँद निकल आया ,जैसे नाफरमानी जोड़ा पहने हुए कोई माशूक़ नज़र आजाता है ,बड़ी कैफियत हुई। चाँदनी छटकते ही जवान ने कहा : अब चल कर बाग़ के बाला खाने में बैठे। मैं ऐसी बेवक़ूफ़  हो गयी थी की जो वह निगोड़ा कहता सो मैं मान लेती। अब यह नाच नचाया की मुझको ऊपर ले गया। वह  कोठा ऐसा बुलंद था को तमाम शहर के मकान और बाजार की चिरागा गोया उसके पाए बाग़ थे। मैं उस जवान  के गले में बाह डाले हुए ख़ुशी के आलम में बैठी थी। इतने में एक रंडी निहायत भोंदी सी सूरत न शक्ल चूल्हे  में से निकल ,शराब का शीशा हाथ में लिए हुए आ पहुंची। मुझे उस वक़्त उसका आना बहुत बुरा लगा और उसकी सूरत  देखने से दिल में होल उठी।

तब मैंने घबरा कर जवान से पूछा की यह तोहफा कौन है ? तूने कहा से पैदा किया ? वह जवान हाथ बांध कर कहने लगा  की वही लौंडी है। जो उस बाग़ के साथ हुज़ूर की इनायत से खरीद हुई। मैंने मालूम किया की उस बेवक़ूफ़ ने बड़ी ख्वाहिश  से इसको लिया है। शायद उसका दिल इस पर राज़ी है। इसी खातिर से ताब खा कर मैं चुपकी हो रही  लेकिन दिल उसी वक़्त से न ख़ुशी मिज़ाज पर छा गयी। तुसपर क़यामत ऐसे तैसे ने यह की ,की साक़ी उसी छिनाल को बनाया  . उस वक़्त मैं अपना लहू पीती थी ,और जैसे तोती को कोई कव्वे  के साथ एक पिंजरे में बंद करता  है।  न जाने की फुर्सत पाती थी ,और न बैठने को दिल चाहता था ,क़िस्सा मुख़्तसर। वह शराब बूँद की बूँद थी  ,जिसके पीने से आदमी हैवान हो जाये। वह चार जाम पे दर पे इसी तेज़ाब के जवान को दिए और आधा प्याला  जो उनकी  मन्नत से मैंने भी ज़हर मार किया। आखिर बे हहया भी बदमस्त हो कर ,इस मरदूद से बेहूदा अदाए करने लगी  और वह चिबिल्ला भी नशे में  बे लेहाज़ हो चला , और नामकूल हरकते करने लगा।

 

           मुझे यह गैरत आयी ,अगर उस वक़्त ज़मीन भी फटे तो मैं समां जाऊ ,लेकिन उसकी दोस्ती के लिए मैं उस पर चुप रही  .पर वह तो असल का पाजी था मेरे उस दरगुज़र करने को न समझा। नशे की लहर में और भी दो प्याले चढ़ा गया  ,की रहता सहता होश भी जो था वह भी गुम हो गया। और मेरी तरफ से धड़ का जी उठा दिया। बे शर्मी से शहवत  के ग़लबे में ,मेरे रु बा रु उस बे हया ने उस बंदोड़ से सोहबत की ,और वह पछल पायी उस हालत में निचे पड़ी हुई  नखरे तल्ले  करने लगी। और दोनों में चूमा चाटी होने लगी। न उस बे वफ़ा में वफ़ा रही न उस बे हया में हया  जैसी रूह वैसे फ़रिश्ते। मेरी उस वक़्त यह  हालत थी जैसे अवसर चुकी डुमनी  ,गावे बे ताल। अपने ऊपर लानत करती थी  कि क्यू तू यहाँ आयी , जिसकी यह सजा पायी ?  आखिर कहा तक सहु ,मेरे सर से पाव तक आग   लग गयी और अंगारो पर लौटने लगी। उस गुस्से और तैश में वहा से उठी

वह शराबी अपनी खराबी दिल में सोचा ,की अगर बादशाह ज़ादी उस वक़्त न खुश हुई तो कल मेरा क्या हाल होगा और सुबह  को क्या क़यामत मचेगी ? अब बने तो उसका काम तमाम कर डालूं। यह इरादा इस ग़ायबानी की सलाह  से जी में ठहरा कर ,गले में पिटका डाल कर मेरे पाव आकर पड़ा , पगड़ी सर से उतार कर मन्नत व ज़ारी  करने  लगा। मेरा दिल तो उस पर लट्टू हो रहा था। जिधर लिए फिरता था फुर्ती थी और चक्की की तरह में उसके इख़्तियार में  थी। जो कहता था सो करती थी। जो तू मुझे फुसला कर बिठलाया और उसी शराब और अतिशा के दो चार प्याले  भर भर कर ,आप भी पिए मझे भी दिए। एक तो गुस्से के मारे जल भून कर कबाब हो रही थी। दूसरे ऐसी शराब पी। जल्द बेहोश हो गयी कुछ हवस बाक़ी न रहे ,तब उस बेरहम ,नमक हराम ,कट्टर ,संग दिल ने तलवार से  मुझे घायल किया ,बल्कि अपनी होश  में मार चूका। उस दम मेरी आंख खुली तो मुंह से यही निकला। खैर जैसा हमने किया ,वैसा पाया लेकिन तू अपने अपने तये मेरे इस खून न हक़ से बचाना।

किसी से यह भेद ज़ाहिर न करना हमने तो तुझसे जान तक भी दर गुज़र न की। फिर उस खुदा के हवाले कर   कर  .मेरा जी डूब गया। मुझे अपनी सुध बुध कुछ न रही। शायद उस कसाई ने मुझे मुर्दा समझ कर उस संदूक में डाल कर क़िले के दिवार के तले लटका दिया ,सो तूने देखा। मैं किसी का बुरा नहीं चाहती थी। लेकिन यह खराबियाँ क़िस्मत  में लिखी थी। मिटती नहीं करम की रेखा ,इन आँखों के सबब यह कुछ देखा। अगर खूब सुरतो के देखने का दिल शौक़  न होता तो वह बदबख्त मेरे गले का हाल न होता। अल्लाह ने यह काम किया की तुझको वहा पंहुचा  दिया ,और सबब मेरी ज़िन्दगी  का क्या। अब हया जी में आती है की यह रुस्वाई खींच कर या किसी को मुंह न दिखाऊ। पर क्या करू  मरने का इख़्तियार अपने हाथ में नहीं। खुदा ने मार कर फिर जिलाया। आगे देखे क़िस्मत में क्या  लिखा है। ज़ाहिर में तो तेरी दौड़ धुप और खिदमत काम आयी ,जो वैसे ज़ख्मो से शिफा पायी। तूने जान व माल से  मेरे खातिर की और जो कुछ अपनी बिसात थी हाज़िर की। उन दिनों तुझे बे खर्च देख कर सईदी बहार  को खत लिखा। उसमे यही मज़मून  मैं खैर व आफ़ियत से अब फलाने मकान में हु मुझ बद की खबर वाल्दा शरीफा की  खिदमत में पहुँचाना।

उसने तेरे साथ दो कश्तिया नक़द की ,खर्च के खातिर भेज दे। और जब तुझे जवाहर के खरीद करने को ,युसूफ सौदागर  बच्चे की दुकान में भेजा ,मुझे यह भरोसा था की वह काम हौसला हर एक से जल्द आशना हो ,बैठता है। तुझे भी  अजनबी जान कर दोस्ती करने के लिए इतरा कर दावत और ज़ियाफ़त करेगा। सो मेरा मंसूबा ठीक बैठा ,जो कुछ  मेरे दिल में ख्याल आया था ,उसने वैसा ही किया। तू जब उससे क़ौल क़रार फिर आने का कर कर मेरे पास  आया और मेहमानी की हक़ीक़त और उसका उसने मुझसे कहा। मैं दिल में खुश हुई की जब तू उसके घर में जाकर  खाये पियेगा। इसलिए तुझे जल्द रुखसत किया ,तीन दिन के पीछे जब तू वहा से फरागत करके आया और मेरे रु बा रु  गैर हाज़री का शर्मिंदगी से लाया ,मैंने तेरी तश्फी के लिए फ़रमाया : कोई बात नहीं जब उसने राज़ी किया तब तू आया   ,लेकिन बे शर्मी नहीं की दूसरे का अहसान अपने सर पर रखे और उसका बदला न कीजिये ,अब तू भी जाकर  खुद कर और अपने साथ ही साथ ले आ। जब तू उसके घर गया तब मैंने देखा की यहाँ कुछ असबाब  मेहमान दारी का तैयार नहीं ,अगर वह आजाये तो क्या करू ? लेकिन यह फुर्सत पायी की उस मुल्क में क़दीम  से बादशाहो का यह मामूल है की आठ महीने कारोबार मुल्की और माली के वास्ते मुल्क गिरी में बाहर रहते है  ,और चार महीने मौसम बरसात के। क़िला मुबारक में जुलूस फरमाते है। इन दिनों दो चार महीने से बादशाह  यानी वली नेमत मुझ बदबख्त के बंदोबस्त की खातिर मुल्क गिरी को तशरीफ़ ले गए थे।

 

         जब तक उस जवान के आठ लेकर आये , की सईदी बहार ने मेरा अहवाल खिदमत में बादशाह बेगम की ( वाल्दा मुझ नापाक  की है ) अर्ज़ किया।  फिर मैं अपनी तक़सीर और गुनाह से शर्मिंदा होकर  जाकर खड़ी हु ,और जो पहले हुआ सब बता दिया।  हर पल उन्होंने मेरे गायब होने की कैफियत ,दूर अंदेशी और महरे मादरी से छिपा रखी थी।  की खुदा जाने उसका अंजाम किया हो ,अभी यह रुस्वाई ज़ाहिर करनी खूब नहीं  मेरे बदले मेरे अएबो  को अपने पेट में रख छोड़ा था ,लेकिन मेरी तलाश में थी। जब मुझे उस हालत में देखा और सब माजरा सुना ,आंसू भर लाये  और फ़रमाया : अये कम्बख्त ,तूने जान बूझ कर नाम व निशान बादशाहत का सारा खोया। हज़ार अफ़सोस ! और अपनी ज़िन्दगी से भी हाथ धोया। काश की तेरे बदले में पत्थर जन्ति तो सब्र आजाता। अब भी तोबा कर जो क़िस्मत में था  सो हुआ ,अब आगे क्या करेगी ? जियेगी या मारेगी ? मैंने निहायत शर्मिंदगी से कहा की मुझ बे हया   के नसीबो में यही लिखा था ,जो इस बदनामी और खराबी में ऐसी आफतो से बच कर जीती रहु। उससे मरना ही भला था  अगरचे कलंक का टीका मेरे माथे पर लगा पर ऐसा काम  नहीं किया ,जिसमे माँ बाप के नाम को ऐब लगे।

अब यह बड़ा दुःख है की वह दोनों बे हया मेरे हाथ से बच जाये और आपस में रंगरलिया मनाये ,और मैं उनके हाथो से  यह कुछ दुःख देखु ,यह उम्मीद वार हु की खानसमा को परवानगी हो ,तो असबाब ज़ियाफ़त का बा खूबी तमाम  उस कम्बख्त के मकान में तैयार करे ,तो मैं दावत के बहाने से इन दोनों बदबख़्तो को बुलवा कर ,उनके हमलो की सजा  दूँ ,और अपना औज़ लू।  जिस तरह उसने मुझ पर हाथ छोड़ा और घायल किया। मैं भी दोनों के पुर्ज़े  पुर्ज़े करू तब मेरा कलेजा ठंडा हो।  नहीं तो इस गुस्से की आग में फुंक रही हु। यह सुन कर अम्मा ने  आत्मा के दर्द  से मेहरबान हो कर मेरी ऐब पोशी की और सारा चीज़े ज़ियाफ़त का उसी ख्वाजा सिरा के साथ कर दिया। सब अपने अपने  कारखाने में आकर हाज़िर हुए। शाम के वक़्त तू उस को लेकर आया ,मुझे उस बांदी का भी आना  मंज़ूर था।

चुनांचा उसे बुलवाया। जब वह भी आयी और मजलिस जमी ,शराब पी पी  कर सब बदमस्त और बेहोश हुए  .और उनके साथ तू भी  कैफ़ी होकर ,मुर्दा सा पड़ा मैंने किल्मा को हुक्म दिया की इन दोनों का सर तलवार से काट डाल  , उसने वह नहीं एक एकदम से तलवार निकल कर ,दोनों के सर काट ,बदन लाकर दिए। और तुझ पर गुस्से का या आलम  था की मैंने इजाज़त ज़ियाफ़त की दी थी। न दो दिन की दोस्ती पर यक़ीन करके ,शरीक में खोरी का हो। अलबत्ता  यह तेरी हिमाक़त पसंद न आयी। इस वास्ते जब तू पी पाकर बेहोश हुआ ,पर तेरी खिदमत के हक़   ऐसे मेरी  गर्दन पर है की तुझसे ऐसी हरकत होती है ,तो माफ़ करती हु। ले मैंने अपनी हकीकत शुरू से आखिर तक कह दी  ,अब भी   दिल में कोई हवस बाक़ी है जैसे मैंने तेरी खातिर करके ,तेरे कहने को सब तरह क़ुबूल  किया ,तू भी मेरा फरमाना  इसी सूरत से अमल में ला। सलाह वक़्त यह है की अब इस शहर में रहना मेरे और तेरे हक़ में भला नहीं।  आगे तू मुख़्तार है।

या माबूद अल्लाह ! शहज़ादी इतना फरमा कर चुप रही। फ़क़ीर दिल व जान से उसके हुक्म को सब चीज़ पर मुक़द्दम  जनता था ,उसके मुहब्बत के जाल में फंसा था ,बोला : जो मर्ज़ी मुबारक  में आये सो बेहतर है। यह फड़वी बिला उज़्र  बजा लाएगा। जब शहज़ादी ने मेरे फ़रमाबरदार व खिदमत गार अपना पूरा समझा ,फ़रमाया : दो घोड़े चालक  और जान बाज़  बादशाह के खास अस्तबल से मंगवा कर तैयार रख। मैंने वैसे ही परी ज़ाद चार गुर्दे के घोड़े  चुन कर ,जैन बंधवा कर मंगवाए। जब थोड़ी सी रात बाक़ी रही ,बादशाह ज़ादी मरदाना लिबास पहन और पांचो  हथियार बांध कर एक घोड़े पर सवार हुई और दूसरे मरकब पर ,मैं मुसलह होकर चढ़ बैठा और एक तरफ की राह ली।

 

           जब शाम तमाम हुई तब एक पोखर के किनारे पहुंचे। उतर कर मुंह हाथ धोये ,जल्दी जल्दी कुछ नाश्ता करके  फिर सवार  होकर चले। कभी मलका कुछ कुछ बाते करती और यु कहती की हमने तेरी कहती शर्म हया ,मुल्क ,माल ,माँ बाप सब छोड़ा ,ऐसा न हो की तू भी उस ज़ालिम बे वफ़ा की तरह सुलूक करे। इधर मैं कुछ अहवाल इधर उधर  का राह कटने के लिए कहता ,और उसका भी जवाब देता की बादशाह ज़ादी ! सब आदमी एक से नहीं होते  .उस पाजी के नुत्फे में कुछ खलल होगा ,जो उससे ऐसी हरकत वाक़य हुई।  और मैंने तो जान व माल तुम पर सदक़ किया और तुमने मुझे हर तरह से सरफ़राज़ी बख्शी ,अब मैं बंदा बगैर दामों का हूँ मेरे चमड़े की अगर जूतियाँ बनवा कर पह्नु ,तो मैं आह न करू। ऐसी ऐसी बाते बाहम होती रही। और रात दिन चलने से काम था। कभी  जो मंदगी के सबब कही उतरते ,तो जंगल के चरिन्द परिन्द शिकार करते ,हलाल करके ,नमक निकाल ,चकमक  से आग झाड़ भून भान कर खा लेते। और घोड़ो को छोड़ देते वह अपने मुंह से घास पात चरचुग कर ,अपना पेट  भर लेते। 

एक रोज़ ऐसे   मैदान में  जा निकले की जहा बस्ती  का नाम न था , और आदमी की सूरत नज़र न आती थी , उसपर   बादशाह ज़ादी  की रिफ़ाक़त के सबब से , दिन ईद और रात शबे बारात मालूम होती थी। जाते जाते एक दरिया  राह में मिला। किनारे पर खड़े होकर  देखा , तो जहा तलक निगाह ने   काम किया ,पानी ही पानी था कुछ थल बेड़ा न पाया  .या इलाही ! अब इस समुन्दर से कैसे पार उतरे ! एकदम इसी सोच में खड़े रही।    आखिर यह  दिल  में लहर आयी ,की मलका को यही  बिठा कर मैं तलाश में नाव निवाड़े की जाऊ ,जब तलक असबाब गुज़ारे का  हाथ आये तब तलक वह नाज़नीन भी आराम पाए ,तब मैंने कहा : अये मलका ! अगर हुक्म हो तो घाट बाट इस दरिया का  देखु। फरमाने लगी ! मैं बहुत तक गयी हु ,और भूकी प्यासी हो रही हु  मैं ज़रा आराम करलु  जब तक  तू पार चलने की तदबीर कर।

उस जगह एक दरख्त पीपल का था बड़ा  ,छत्तर बांधे हुए की अगर हज़ार सवार आये ,तो धुप और मीह  में उसके तले आराम पाए। वहा मैं उसको बिठा कर चला और चारो तरफ देखता था की कही भी ज़मीन पर। या दरिया में  निशान इंसान  का पाऊ। बेहतर सर मारा पर कही न पाया। आखिर मायूस होकर वहा से फिर आया ,तो परी को पेड़ के नीचे न पाया। उस वक़्त की हालत क्या कहु की सुरत जाती रही ,दीवाना बावला हो गया। कभी दरख्त पर चढ़  जाता ,और डाल डाल पर फिरता। कभी हाथ पाव छोड़ कर ज़मीन में गिरता और  उस दरख्त की जड़ के आस  पास तस्दक होता। किधर चिंघाड़ मारु ,अपनी बे बसी पर रोता। कभी पच्छिम से पूरब को दौड़ता गरज़ बेहतरी खाक छानी  लेकिन उस गौहर नायाब की निशानी न मिली। जब मेरा कुछ बस न चला ,तब रोता और ख़ाक सर पर उड़ाता हुआ तलाश हर कही करने लगा।

दिल में यह ख्याल आया  शायद कोई जिन्न उस पारी को उठा ले गया ,और मुझे यह दाग दे गया। या उसके मुल्क से कोई उसके पीछे  लगा चला आता था ,उस वक़्त अकेला पाकर मना मनो लेकर फिर शाम की तरफ  ले उभरा। ऐसे ख्यालो  में घबरा कर ,कपडे वपड़े फ़ेंक दिए। नंगा मंगा फ़क़ीर बन कर ,शाम के मुल्क में सुबह व शाम तक ढूंढता  फिरता और रात को कही पड़ा रहता। सारा जहाँ रोंद मारा पर अपनी बादशाह ज़ादी का नाम व निशान किसी से  न सुना ,न सबब गायब होने का मालूम हुआ। तब दिल में यह आया की जब उस जान का तूने कुछ पता न  पाया, अब जीना भी हैफ़ है। किसी जंगल में एक पहाड़ नज़र आया ,तब उस पर चढ़ गया और यह इरादा किया की खुद गिरा दू  ,की एक दम में सर मुंह पत्थरो से टकराते टकराते फूट जायेगा तो ऐसी मुसीबत से जी छूट जायेगा।

 

          यह दिल में कह कर चाहता हु की खुद गिराऊं बल्कि पाव भी उठ चुके थे की किसी ने मेरा हाथ पकड़ लिया। इतने  में होश आगया तो देखता हु तो एक हज़ार सब्ज़ पोश मुंह पर नक़ाब डाले ,मुझे फरमाता है की क्यू तू अपने मरने का क़स्द करता है ? खुदा के फ़ज़ल से न उम्मीद होना कुफ्र है। जब तलक सांस है तब तलक आस है। अब थोड़े दिनों में  रूम के मुल्क में तीन दरवेश तुझ सारके ऐसी ही मुसीबत  में फंसे हुए ,और ऐसे ही तमाशा देखे हुए तुझसे  मुलाक़ात  करेंगे। और वहा के बादशाह का आज़ाद बख्त नाम है। उसको भी एक मुश्किल दरपेश है। जब वह भी  तुम चारो फ़क़ीरों के साथ मिलेगा तो हर एक के दिल का मतलब और मुराद जो है ,बा खूबी हासिल होगी।

मैंने रकाब पकड़ कर बोसा दिया और कहा : अये  खुदा के वली ! तुम्हारे इतने ही  फरमाने से मेरे दिल को तसल्ली हुई ,लेकिन खुदा के वास्ते यह फरमाइए की  आप कौन है और आपका नाम क्या है ? तब उन्होंने फ़रमाया की मुर्तज़ा  अली मेरा नाम है और मेरा यही काम है ,की जिसको जो मुश्किल कठिन पेश आये तो मैं उसको आसान कर दूँ।  इतना फरमा कर नज़रो से पोशीदा हो गये। बारे ,उस फ़क़ीर ने अपने मौला मुश्किल कशा  की बशारत से खातिर  जमा  कर क़स्द कुस्तुन्तुनिया का क्या। राह में जो कुछ मुसीबते क़िस्मत  में लिखी थी ,खींचता हुआ। उस बादशाह ज़ादी  की मुलाक़ात के भरोसे ,खुदा के फ़ज़ल से यहाँ तक आ पंहुचा। और अपनी खुश नसीबी से  तुम्हारे खिदमत  में मुशर्रफ हुआ। हमारे तुम्हारे आपस में मुलाक़ात तो हुई ,बाहम सोहबत  चीत हुई। अब चाहिए  की बादशाह  आज़ाद बख्त से भी रोशनास और जान पहचान हो।

 बाद उसके मुक़र्रर हम पांचो अपने मक़सद दिली को पहुचंगे। तुम भी दुआ मांगो और अमीन कहो। या हादी ! उस हैरान  सर गर्दान की सर गुज़िश्त यह थी ,जो हुज़ूरी में दरवेशो की कह सुनाई। अब आगे देखिये की कब यह मेहनत और ग़म हमारा बादशाह ज़ादी के मिलने से ,ख़ुशी से बदल हो।

 आज़ाद बख्त एक कोने में छिपा हुआ ,चिपका ध्यान लगाए ,पहले दरवेश का माजरा सुन कर खुश हुआ फिर दूसरे  दरवेश की हक़ीक़त को सुनने लगा। 



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